दहेज निरोधक कानून के तहत जेल में बंद लोगों के लिए एक राहत की खबर है। इस कानून के गलत इस्तेमाल की शिकायतों के बीच विधि आयोग ने इसे कुछ नरम बनाने की सिफारिश की है। उसका सुझाव है कि मामले में पीड़ित महिला को अदालत की अनुमति से मुकदमा वापस लेने की छूट भी होनी चाहिए। साथ ही कानून में दोनों पक्षों में समझौते का प्रावधान भी होना चाहिए। कानून में यदि यह बदलाव होते हैं तो साफ है कि इसके तहत गिरफ्तार लोगों के लिए जमानत पाना आसान हो जाएगा।
कानून मंत्रालय को भेजी अपनी सिफारिशों में विधि आयोग ने कहा है कि महिला पर यदि कोई बाहरी दबाव नहीं है तो ऐसे में उसे मुकदमा वापस लेने की छूट होनी चाहिए। आयोग ने कहा है कि दहेज प्रताड़ना से संबंधित भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498-ए को कंपाउंडेबल (समझौता योग्य) ऑफेंस बनाया जाए। कंपाउंडेबल ऑफेंस वह मामले हैं, जिन विवादों में दोनों पक्षों में समझौता हो सकता है। इसमें अदालत की अनुमति भी जरूरी नहीं होती।
जस्टिस पीवी रेड्डी की अध्यक्षता वाले विधि आयोग ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 320 में उप धारा (2ए) जोड़ने का प्रस्ताव भी किया है। प्रस्तावित प्रावधान यह सुनिश्चित करेगा कि मामले में समझौता करना स्वैच्छिक हो। इसमें किसी का दबाव नहीं हो। समझौते की पेशकश के बाद पत्नी के साथ दुर्व्यवहार नहीं हो। साथ ही इसमें कहा गया है कि धारा 498-ए के तहत समझौते के आवेदन पर अदालत की सक्रियता की जरूरत नहीं है। मालूम हो कि दहेज एक्ट के महिलाओं द्वारा गलत इस्तेमाल की शिकायतें लगातार बढ़ती जा रही हैं। इसी के मद्देनजर विधि आयोग आईपीसी की धारा 498-ए को पति के संबंधियों के लिए जमानती अपराध बनाने की संभावना पर विचार कर रहा था।
अभी कानून में है कि यदि इसके तहत किसी को गिरफ्तार किया जाता है तो वह मामला लंबित रहने तक जेल में ही रहेगा। इसकी धाराओं के तहत पति या उसके परिजनों को बिना जांच के लिए जेल में डाला जा सकता है। इसके तहत महिला या उसके परिजनों द्वारा पुलिस से की शिकायत के तहत अपराध गैर जमानती, गैर कंपाउंडेबल होने के साथ संज्ञेय है। इसके अलावा में इसमें समझौते का कोई प्रावधान नहीं है! Source : Adalat